आज आपके लिए बिल्कुल ताज़ा ग़ज़ल ? पेश कर रहा हूं ।आशा हॆ पसंद आएगी ।आपके विचार जानने की उत्कंठा हॆ ।
कितनी आवाजों को करके अनसुना मॆने
फिर वही क़ातिल चुना हॆ रहनुमा मॆंने
मोम का पुतला बना फिरता हॆ पूरे शहर में
उम्र भर जिसको जिया पत्थरनुमा मॆंने
सिरफिरे से पत्थरों ने खिड़कियों से बात की
कह दिया था सच कोई खंजरनुमा मॆंने
आज भी महफूज हॆ तेरे दुपट्टे की छुअन
क्या कहूं कितना किया इसपर गुमां मॆंने
कितनी आवाजों को करके अनसुना मॆने
फिर वही क़ातिल चुना हॆ रहनुमा मॆंने
मोम का पुतला बना फिरता हॆ पूरे शहर में
उम्र भर जिसको जिया पत्थरनुमा मॆंने
सिरफिरे से पत्थरों ने खिड़कियों से बात की
कह दिया था सच कोई खंजरनुमा मॆंने
आज भी महफूज हॆ तेरे दुपट्टे की छुअन
क्या कहूं कितना किया इसपर गुमां मॆंने
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